सकारात्मक गुरु के कारण जातक की आंखों में चमक और चेहरे पर तेज होता है। अपने ज्ञान के बल पर दुनिया को झुकाने की ताकत रखने वाले ऐसे व्यक्ति के प्रशंसक और हितैषी बहुत होते हैं। ऐसे व्यक्ति मिलनसार और ख्याति प्राप्त होते हैं। वे प्रतिभाशाली होने के बावजूद नम्र स्वभाव वाले होते है। तथा दूसरों की हर संभव सहायता करते है। जातक उच्च शिक्षा प्राप्त करता है और अपने जीवन में अच्छा धन कमाता है और ऊंचाइयां को प्राप्त करता है।
बृहस्पति ग्रह की शांति के टोटके/उपाय
(3) माथे व नाभि और जीभ पर केसर तिलक लगाएं।
(4) गुरु से संबंधित वस्तुओं का मंदिर में दान करें।
(5) पिता ,गुरु व साधु का अपमान न करें।
(6) किसी भी पूजा स्थल के सामने सिर झुकाएं।
(7) माता-पिता व बुजुर्गो का ध्यान रखें।
(8) पितरों की पूजा समय समय पर यथाशक्ति अनुसार करते रहे।
(9) धर्म विरुद्ध कभी भी आचरण न करें। ।
(10) गुरु-पुष्य या पुनर्वसु नक्षत्र में भगवान नारायण की पूजा करें।
बृहस्पति की वस्तुओं का दान
बृहस्पति का दान वाली वस्तुओं में दान-द्रव्य: पुखराज, सोना, कांसी, चने की दाल, खांड, घी, पीला कपड़ा, पीला फूल, हल्दी, पुस्तक, घोड़ा, पीला फल आदि वस्तुओं है। यह दान प्रत्येक बृहस्पतिवार के दिन किया जा सकता है।
नोट-: किसी भी ग्रह का दान करने से पहले किसी अच्छे ज्योतिषी से अपनी कुंडली का विश्लेषण करा लेने के बाद ही दान करना चाहिए क्योंकि कुंडली में बैठे ग्रहों के आधार पर ही जान सकते हैं की किस ग्रह का दान करना चाहिए और किस ग्रह का दान नहीं करना चाहिए।
बृहस्पति के मंत्र व रत्न
बृहस्पति का रत्न -: पुखराज
(Topaz)
बृहस्पति गायत्री मंत्र -: ॐ अंगिरो जाताय विद्महे वाचस्पतये धीमहि तन्नो गुरु प्रचोदयात् ॥
बृहस्पति मंत्र जाप संख्या -: 19 हजार मंत्र जाप
बृहस्पति का तांत्रोक्त मंत्र -: ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरुवे नम:
बृहस्पति का वैदिक मंत्र -: ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्बिभाति क्रतुमज्जनेषु।
यद्दीदयच्छवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्।।
बृहस्पति का पौराणिक मंत्र -: देवानां च ऋषिणा च गुर्रु कान्चन सन्निभम । बुद्यिभूतं त्रिलोकेश तं गुरुं प्रण्माम्यहम।।
बृहस्पति की सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाने के लिए तथा नकारात्मक उर्जा को कम करने के लिए उपरोक्त उपाय के साथ-साथ बृहस्पति स्तोत्र बृहस्पति ग्रह कवच ,पढ़ सकते हैं, साथ ही बृहस्पति देव की आरती भी कर सकते हैं।
॥ अथ बृहस्पतिकवचम् ॥
II श्री गणेशाय नमः II
अस्य श्रीबृहस्पतिकवचस्तोत्रमंत्रस्य ईश्वरऋषिः । अनुष्टुप् छंदः । गुरुर्देवता ।
गं बीजं श्रीशक्तिः ।क्लीं कीलकम् । गुरुपीडोपशमनार्थं जपे विनियोगः ॥
अभीष्टफलदं देवं सर्वज्ञम् सुर पूजितम् ।अक्षमालाधरं शांतं प्रणमामि बृहस्पतिम् ॥ 1 ॥
बृहस्पतिः शिरः पातु ललाटं पातु मे गुरुः ।कर्णौ सुरगुरुः पातु नेत्रे मे अभीष्ठदायकः ॥ 2 ॥
जिह्वां पातु सुराचार्यो नासां मे वेदपारगः ।मुखं मे पातु सर्वज्ञो कंठं मे देवतागुरुः ॥ 3 ॥
भुजावांगिरसः पातु करौ पातु शुभप्रदः ।स्तनौ मे पातु वागीशः कुक्षिं मे शुभलक्षणः ॥ 4 ॥
नाभिं केवगुरुः पातु मध्यं पातु सुखप्रदः ।कटिं पातु जगवंद्य ऊरू मे पातु वाक्पतिः ॥ 5 ॥
जानुजंघे सुराचार्यो पादौ विश्वात्मकस्तथा ।अन्यानि यानि चांगानि रक्षेन्मे सर्वतो गुरुः ॥ 6 ॥
इत्येतत्कवचं दिव्यं त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः ।सर्वान्कामानवाप्नोति सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ 7 ॥
॥ इति श्रीब्र्ह्मयामलोक्तं बृहस्पतिकवचं संपूर्णम् ॥
॥ बृहस्पतिस्तोत्रम् ॥
श्री गणेशाय नमः ॥
अस्य श्रीबृहस्पतिस्तोत्रस्य गृत्समद ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः,
बृहस्पतिर्देवता, बृहस्पतिप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ॥
गुरुर्बृहस्पतिर्जीवः सुराचार्यो विदांवरः ।
वागीशो धिषणो दीर्घश्मश्रुः पीताम्बरो युवा ॥ 1॥
सुधादृष्टिर्ग्रहाधीशो ग्रहपीडापहारकः ।
दयाकरः सौम्यमूर्तिः सुरार्च्यः कुङ्मलद्युतिः ॥ 2॥
लोकपूज्यो लोकगुरुर्नीतिज्ञो नीतिकारकः ।
तारापतिश्चाङ्गिरसो वेदवैद्यपितामहः ॥ 3॥
भक्त्या बृहस्पतिं स्मृत्वा नामान्येतानि यः पठेत् ।
अरोगी बलवान् श्रीमान् पुत्रवान् स भवेन्नरः ॥ 4॥
जीवेद्वर्षशतं मर्त्यो पापं नश्यति नश्यति ।
यः पूजयेद्गुरुदिने पीतगन्धाक्षताम्बरैः ॥ 5॥
पुष्पदीपोपहारैश्च पूजयित्वा बृहस्पतिम् ।
ब्राह्मणान्भोजयित्वा च पीडाशान्तिर्भवेद्गुरोः ॥ 6॥
॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे बृहस्पतिस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
॥आरती श्री बृहस्पति देवता की॥
जय वृहस्पति देवा, ऊँ जय वृहस्पति देवा ।
छिन छिन भोग लगाऊँ, कदली फल मेवा ॥
जय वृहस्पति देवा……………………………
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी।
जगतपिता जगदीश्वर, तुम सबके स्वामी ॥
जय वृहस्पति देवा……………………………
चरणामृत निज निर्मल, सब पातक हर्ता।
सकल मनोरथ दायक, कृपा करो भर्ता ॥
जय वृहस्पति देवा……………………………
तन, मन, धन अर्पण कर, जो जन शरण पड़े।
प्रभु प्रकट तब होकर, आकर द्घार खड़े ॥
जय वृहस्पति देवा……………………………
दीनदयाल दयानिधि, भक्तन हितकारी ।
पाप दोष सब हर्ता, भव बंधन हारी ॥
जय वृहस्पति देवा……………………………
सकल मनोरथ दायक, सब संशय हारो ।
विषय विकार मिटाओ, संतन सुखकारी ॥
जय वृहस्पति देवा……………………………
जो कोई आरती तेरी, प्रेम सहत गावे ।
जेठानन्द आनन्दकर, सो निश्चय पावे ॥
जय वृहस्पति देवा, ऊँ जय वृहस्पति देवा ।
छिन छिन भोग लगाऊँ, कदली फल मेवा ॥
