ध्याये नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं,रत्नाकलोज्ज्वलांगं परशुमृगवराभीति हस्तं प्रसन्नं।पद्माशीनं समन्तात स्तुरिममरगणेव्यार्घृतिं
वसानं,विश्ववाध्यं विश्ववन्द्यम निखिल भहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम॥स्वच्छ स्वर्णपयोदं भतिकजपावर्णेभिर्मुखे: पंचभि:,त्र्यक्षरैचितिमीशमिन्दुमुकुटं सोमेश्वराख्यं प्रभुम।शूलैटंक कृपाणवज्रदहनान-नागेन्द्रघंटाकुशान,पाशं भीतिहरं उधानममिताकल्पोज्ज्वलांग भेजे॥
कुलिक कालसर्प योग का फल
कुलिक काल सर्प योग तब बनता है जब दूसरे भाव में राहु और आठवें भाव में केतु हों और अन्य सब ग्रह इनके मध्य स्थित हो तब यह दोष बनता है। इस योग से पीड़ित होने पर जातक को आर्थिक कष्ट का सामना करना पड़ता है, जातक पैसे बचाने में असमर्थ होता है। चोरी धोखाधड़ी आदि के माध्यम से जातक का पैसा खराब हो जाता है या चला जाता है। साथ ही पारिवारिक स्थिति भी संघर्षमय और कलह पूर्ण होती है. सामाजिक तौर पर भी ऐसे जातक की स्थिति अच्छी नहीं रहती. फल स्वरुप जातक वाणी दोष से पीड़ित होता है। कुलिक कालसर्प दोष के कारण जातक पेट विकारों से परेशान रहता है उसके जीवन में कोई न कोई परेशानी लगातार चलती रहती है जिससे जातक मानसिक परेशान रहता है और चिड़चिड़ा स्वभाव का होता चला जाता है जिससे लोग उसे झगड़ालू समझने लगते हैं, कुलिक कालसर्प दोष जातक के आर्थिक, मानसिक व सामाजिक तीनों स्थिति पर बुरा असर डालता है
प्रत्येक माह के पहले शनिवार को दो रंग का कम्बल दान करे. काला और सफेद
जीवन में कम से कम तीन बार सवा लाख संख्या का महामृत्युंजय का जाप कराएं।
शनिवार के दिन राहु यंत्र को जागृत करा कर के अपने गले में धारण करें |
किसी भी मंदिर में प्रतिष्ठित शिवलिंग पर मिश्री एवं दूध अर्पित करना चाहिए।
शिव तांडव स्तोत्र का प्रतिदिन पाठ करने से भी शुभ फल की प्राप्ति होती है ।
राहु की पूजा शिव मंदिर में रात के समय या राहु काल की अवधि में करें ।
जीवन में कभी भी बीड़ी, सिगरेट, मांस और मदिरा आदि का सेवन न करें।
दिन में सोने की आदत कभी ना डालें और आलस से सदैव दूर रहे ।
अपने पड़ोसियों व मित्रों से सावधानी बरतें ।
अपने माता पिता के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध रखें।
हमेशा जीवन में सावधानी बरतें तथा धोखे और फरेब से बचें।
कालसर्प दोष के दुष्प्रभावों को कम करने के लिये तथा जीवन में सकारात्मक स्थिति प्राप्त करने के लिए नित्य प्रतिदिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ स्वच्छ और शुद्ध वस्त्र धारण करें । उसके बाद अपना मुंह पूर्व दिशा में रखें और कुशा या कपड़े के आसन पर बैठ जाएं। और पहले गाय के घी का दिया जलाएं और एक लोटे में शुद्ध जलभरकर रखें। और मिश्री का प्रसाद रखें। तत्पश्चात भगवान शिव के समक्ष धूप, दीप प्रज्वलित करके रखे, उसके बाद फल, फूल, बेलपत्र आदि के द्वारा पूजा करें और शिव पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ 3,5,11 या फिर 40 बार करें
नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै न काराय नमः शिवाय ॥1॥
मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय ।
मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय तस्मै म काराय नमः शिवाय ॥2॥
शिवाय गौरीवदनाब्जबृंदा सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै शि काराय नमः शिवाय॥3॥
वशिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य मूनीन्द्र देवार्चिता शेखराय ।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय तस्मै व काराय नमः शिवाय ॥4॥
यज्ञस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै य काराय नमः शिवाय॥5॥
पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसंनिधौ ।शिवलोकमावाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥
शिव पंचाक्षर स्तोत्र संपूर्ण
शिव पंचाक्षर स्तोत्र हिंदी में प्रारंभ
जो श्रद्धालु जन शिव पंचाक्षर स्तोत्र को संस्कृत में नहीं पढ़ सकते हैं अथवा शुद्ध नहीं पढ़ पाते त्रुटि के साथ पढ़ते हैं तो उन सब के लिए शिव पंचाक्षर स्तोत्र हिंदी में दिया जा रहा है ताकि आप बिना किसी त्रुटि के शुद्धता भगवान शिव के इस पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ कर सके।
शिव पंचाक्षर स्तोत्र का हिंदी में अर्थ
(1)
वह भगवान जो नागों का हार धारण करने वाले हैं , और जिनकी तीन आँखें हैं, जिनके शरीर पर पवित्र राख मली हुई है और जो महान प्रभु है, वे जो शाश्वत है, जो पूर्ण पवित्र हैं और चारों दिशाओं को जो अपने वस्त्रों के रूप में धारण करते हैं, उस शिव को नमस्कार है, जिन्हें शब्दांश “न” द्वारा दर्शाया गया है।
(2)
वे जिनकी पूजा मंदाकिनी नदी के जल से होती है और चंदन का लेप लगाया जाता है, वे जो नंदी के और भूतों-पिशाचों के स्वामी हैं, महान भगवान, वे जो मंदार और कई अन्य फूलों के साथ पूजे जाते हैं, उस शिव को प्रणाम है, जिन्हें शब्दांश “म” द्वारा दर्शाया गया है।
(3)
वे जो शुभ है और जो नए उगते सूरज की तरह है, जिनसे गौरी का चेहरा खिल उठता है, वे जो दक्ष के यज्ञ के संहारक हैं, वे जिनका कंठ नीला है, और जिनके प्रतीक के रूप में बैल है, उस शिव को नमस्कार है, जिन्हें शब्दांश “शि” द्वारा दर्शाया गया है।
(4)
वे जो श्रेष्ठ और सबसे सम्मानित संतों – वशिष्ट, अगस्त्य और गौतम, और देवताओं द्वारा भी पूजित है, और जो ब्रह्मांड का मुकुट हैं, वे जिनकी चंद्रमा, सूर्य और अग्नि तीन आंखें हों, उस शिव को नमस्कार है, जिन्हें शब्दांश “वा” द्वारा दर्शाया गया है ।
(5)
वे जो यज्ञ (बलिदान) का अवतार है और जिनकी जटाएँ हैं, जिनके हाथ में त्रिशूल है और जो शाश्वत हैं, वे जो दिव्य हैं, जो चमकीला हैं, और चारों दिशाएँ जिनके वस्त्र हैं, उस शिव को नमस्कार है, जिन्हें शब्दांश “य” द्वारा दर्शाया गया है।
जो शिव के समीप इस पंचाक्षर का पाठ करते हैं, वे शिव के निवास को प्राप्त करेंगे और आनंद लेंगे।
शिव पंचाक्षर स्तोत्र समाप्त
शिव पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ पूरा हो जाने के पश्चात भगवान शिव की कपूर जलाकर आरती करें और आरती करने के बाद लोटे का जल सारे घर में छिड़क दें थोड़ा सा जल स्वयं पी लें और मिश्री प्रसाद के रूप में खाएं, घर में भी मिश्री प्रसाद सभी को दें।
ॐ नव कुलाय विध्महे विषदन्ताय धी महि तन्नो सर्प प्रचोदयात ll
मैं भगवान श्री शंकर जी से प्रार्थना करता हूं कि भगवान शंकर आपके ऊपर तथा आपके परिवार के ऊपर सदा अपनी कृपा बनाए रखें सदा कल्याण करें।
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