कर्कोटक कालसर्प योग का फल व निवारण और सावधानियां

कर्कोटक कालसर्प योग का फल निवारण और सावधानियां

कर्कोटक कालसर्प योग  

कर्कोटक कालसर्प योग अष्टम भाव में राहु और द्वितीय भाव में केतु के मध्य स्थित अन्य समस्त ग्रह आने के कारण बनता है। इस योग से पीड़ित होने पर जातक को सपने में बार-बार सांप दिखाई देता है, रात में डर के कारण बार-बार नींद खुल जाती है। ऐसे जातकों के भाग्योदय में इस योग की वजह से कुछ रुकावटें अवश्य आती हैं, आयु के सम्बन्ध में कई बार मुसीबतों का सामना करना पड़ता है, बाल्यावस्था में किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न हो जाती है , दुर्घटना होने लगती है , चोट लग जाती हैं, जातक आयु पर्यन्त रोग, शोक, कष्ट तथा शत्रुओं से जातक घिरा रहता है। किसी गंभीर बीमार का इलाज होने पर भी फायदा नहीं होता है। बीमार होने पर भी बीमारी का पता नहीं चलता है। आर्थिक नुकसान और कई प्रकार की उलझनें एक के बाद एक आती रहती है, कारोबार संबंधी समस्या उत्पन्न हो जाती है कारोबार फलीभूत नहीं होता है ,व्यवधान उत्पन्न होते हैं, घर-परिवार और कार्य स्थल पर अनचाहे वाद-विवाद होते रहते हैं। पारिवारिक सबंधों में खटास रहती है अपने परिजनों से मतभेद हो सकते हैं इससे परिवार में विक्षोब उत्पन्न हो सकता है और अकारण ही मन में डर बना रहता है जातक के चरित्र पर बार-बार छींटे लगते हैं, अथवा चरित्र शुद्ध नहीं रहता। शत्रुओं की संख्या बढ़ जाती है। जातक अदालती मामलों में बेकार में पैसे खर्च करता है। वृद्धावस्था कष्टप्रद एवं रोगदायक रहती है।

कर्कोटक कालसर्प योग का निवारण

महामृत्युंजय का जाप कराएं।
चांदी का एक चौकोर टुकड़ा पास रखें।  
सोते समय तकिये के नीचे सौंफ रखें।
माथे पर केसर या हल्दी का तिलक लगाएं।
मंदिरों की धार्मिक यात्रा करें और मंदिरों में सिर झुकाएं।
हर जन्म दिन पर चार  पुजा वाले नारियल नदी में प्रवाहित करे
नागपंचमी के दिन सवा किलो जौ बहते जल में प्रवाहित करे।
माह में एक बार आद्रा स्वाती नक्षत्र में शिव का रुद्राभिषेक अवश्य किया करें।
अपने वजन के बराबर लकड़ी का कोयला चलते पानी में प्रवाहित करना चाहिए
पांच मंगलवार का व्रत करते हुए हनुमान जी को चमेली के तेल में घुला सिंदूर बूंदी के लड्डू चढ़ाएं।  
शनिवार को राहु से संबंधित वस्तुओं जैसे सीसा, सरसों का तेल, तिल, कंबल, धारदार हथियार, स्वर्ण, नीलवर्ण वस्त्र, गोमेद, सूप, काले रंग के पुष्प, अभ्रक, दक्षिणा आदि का दान करें।
कर्कोटक कालसर्प योग के जातक क्या करें,क्या करें    
बुरी करतूतों से बचें।
बेईमानी से पैसे कमाएं।
दक्षिण मुखी मकान में रहें।
नहाते समय मुख पूर्व की ओर रखें
अपने कर्म से किसी का दिल ना दुखाएं
घर की छत बदलने या सुधारने का कार्य कतई करें
घर के आसपास भट्टी जलती हो तो वहाँ भी रहें।
बिजली का काम या बिजली विभाग में काम करें।
घर के आसपास भट्टी जलती हो तो वहाँ भी रहें।
सूर्योदय और सूर्यास्त के समय कुछ ना खाएं, जल ग्रहण कर सकते हैं
कालसर्प के दोष को कम करने के लिये रूद्र-सूक्त का पाठ
कालसर्प के दोष को कम करने के लिये तथा बुरे प्रभाव को दूर करने के लिए भगवान शिव को प्रसन्न करना आवश्यक है और भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए नित्य प्रतिदिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। उसके बाद अपना मुंह पूर्व दिशा में रखें और कुशा या कपड़े के आसन पर बैठ जाएं। और पहले गाय के घी का दिया जलाएं और एक कलश में शुद्ध जल भरकर रखें। और मिश्री प्रसाद रखें। तत्पश्चात भगवान शिव की धूप, दीप , फल , फूल , बेलपत्र आदि से पूजा करें और रूद्र-सूक्त का पाठ करें अथवा रूद्र-सूक्त द्वारा भगवान शिव का अभिषेक करें।
अथ रूद्र-सूक्तम्
नमस्ते रुद्र मन्यवऽ उतो तऽ इषवे नमः। 
बाहुभ्याम् उत ते नमः॥१॥
या ते रुद्र शिवा तनूर-घोरा ऽपाप-काशिनी। 
तया नस्तन्वा शन्तमया गिरिशंताभि चाकशीहि ॥२॥
यामिषुं गिरिशंत हस्ते बिभर्ष्यस्तवे
शिवां गिरित्र तां कुरु मा हिन्सीः पुरुषं जगत् ॥३॥
शिवेन वचसा त्वा गिरिशाच्छा वदामसि
यथा नः सर्वमिज् जगद-यक्ष्मम् सुमनाऽ असत् ॥४॥
अध्य वोचद-धिवक्ता प्रथमो दैव्यो भिषक्।
अहींश्च सर्वान जम्भयन्त् सर्वांश्च यातु-धान्यो ऽधराचीः परा सुव ॥५॥
असौ यस्ताम्रोऽ अरुणऽ उत बभ्रुः सुमंगलः।
ये चैनम् रुद्राऽ अभितो दिक्षु श्रिताः सहस्रशो ऽवैषाम् हेड ऽईमहे ॥६॥
असौ यो ऽवसर्पति नीलग्रीवो विलोहितः।
उतैनं गोपाऽ अदृश्रन्न् दृश्रन्नु-दहारयः दृष्टो मृडयाति नः ॥७॥
नमोऽस्तु नीलग्रीवाय सहस्राक्षाय मीढुषे।
अथो येऽ अस्य सत्वानो ऽहं तेभ्यो ऽकरम् नमः ॥८॥
प्रमुंच धन्वनः त्वम् उभयोर आरत्न्योर ज्याम्। 
याश्च ते हस्तऽ इषवः परा ता भगवो वप ॥९॥
विज्यं धनुः कपर्द्दिनो विशल्यो बाणवान्ऽ उत।
अनेशन्नस्य याऽ इषवऽ आभुरस्य निषंगधिः॥१०॥
या ते हेमीढु तिर ष्टम हस्ते बभूव ते धनुः
तया अस्मान् विश्वतः त्वम् अयक्ष्मया परि भुज ॥११॥
परि ते धन्वनो हेतिर अस्मान् वृणक्तु विश्वतः।
अथो यऽ इषुधिः तवारेऽ अस्मन् नि-धेहि तम् ॥१२॥
अवतत्य धनुष्ट्वम् सहस्राक्ष शतेषुधे। 
निशीर्य्य शल्यानां मुखा शिवो नः सुमना भव ॥१३॥
नमस्तऽ आयुधाय अनातताय धृष्णवे।
उभाभ्याम् उत ते नमो बाहुभ्यां तव धन्वने ॥१४॥
मा नो महान्तम् उत मा नोऽ अर्भकं मा नऽ उक्षन्तम् उत मा नऽ उक्षितम्।
मा नो वधीः पितरं मोत मातरं मा नः प्रियास् तन्वो रूद्र रीरिषः॥१५॥
मा नस्तोके तनये मा नऽ आयुषि मा नो गोषु मा नोऽ अश्वेषु रीरिषः।
मा नो वीरान् रूद्र भामिनो वधिर हविष्मन्तः सदमित् त्वा हवामहे॥१६॥
॥इति: रूद्र-सूक्तम् संपूर्ण॥
रुद्र सूक्त हिंदी अर्थ निम्नलिखित हैं
अर्थ :हे रुद्र आपको नमस्कार है , आपके क्रोध को नमस्कार है , आपके वाण को नमस्कार है और आपकी भुजाओं को नमस्कार है
अर्थ:हे गिरिशन्त अर्थात् पर्वत पर स्थित होकर सुख का विस्तार करने वाले रुद्र आप हमें अपनी उस मङ्गलमयी मूर्ति द्वारा अवलोकन करें जो सौम्य होने के कारण केवल पुण्यों का फल प्रदान करने वाली है
अर्थ: हे गिरिशन्त हे गिरित्र अर्थात् पर्वत पर स्थित होकर त्राण करने वाले आप प्रलय करने के लिए जिस बाण को हाथ में धारण करते हैं उसे सौम्य कर दें और जगत् के जीवों की हिंसा करें
अर्थ: हे गिरिश हम आपको प्राप्त करने के लिए मंगलमय स्तोत्र से आपकी प्रार्थना करते हैं जिससे हमारे यह सम्पूर्ण जगत् रोग रहित एवं प्रसन्न हो
अर्थ: शास्त्र सम्मत बोलने वाले , देव हितकारी ,परमरोग नाशक , प्रथम पूज्य रुद्र हमें श्रेष्ठ कहें और सर्पादिका विनाश करते हुए सभी अधोगामिनी राक्षसियों आदि को भी हमसे दूर करें
अर्थ: ये जो ताम्र , अरुण और पिङ्ग वर्ण वाले मंगलमय सूर्य रूप रुद्र हैं और जिनके चारों ओर जो ये सहस्त्रों किरणों रूप रुद्र हैं , हम भक्ति द्वारा उनके क्रोध का निवारण करते हैं
अर्थ: ये जो विशेष रक्तवर्ण सूर्य रूप नीलकण्ठ रुद्र गतिमान हैं , जिन्हें गोप देखते हैं , जल वाहिकाएं देखती हैं वह हमारे देखे जाने पर हमारा मङ्गल करें
अर्थ: सेचनकारी सहस्त्रों नेत्रों वाले पर्जन्य रूप नीलकण्ठ रूद्र को हमारा नमस्कार है और इनके जो अनुचार है उन्हें भी हमारा नमस्कार है
अर्थहे भगवन् आपके धनुष की कोटियों के मध्य यह जो ज्या है उसे आप खोल दें और आपके हाथ में ये जो वाण हैं उन्हें आप हटा दें और इस प्रकार हमारे लिए सौम्य हो जांयँ
अर्थ: जटाधारी रूद्र का धनुष ज्यारहित , तूणीर फलकहीन वाणरहित , वाण दर्शन रहित और म्यान खंगरहित हो जाय अर्थात् ये सौम्य हो जाएं
अर्थ: हे संतृप्त करने वाले रुद्र आपके हाथ में जो आयुध है और आपका जो धनुष है उपद्रव रहित उस आयुधया धनुष द्वारा आप हमारी सब ओर से रक्षा करें
अर्थ: आप धनुर्धारी का यह जो आयुध है वह हमारी रक्षा करने के लिए हमें चारों ओर से घेरे रहे किन्तु यह जो आपका तरकस है उसे आप हमसे दूर रखें
अर्थ: हे सहस्त्रों नेत्रों वाले , सैकडों तरकस वाले रुद्र आप अपने धनुष को ज्या रहित और वामों के मुखों को फलक रहित करके हमारे लिए सुप्रसन्न एवं कल्याणमय हो जांयँ
अर्थ: हे रुद्र धनुष पर चढाये गये आपके वाण को नमस्कार है , आपकी दोनों भुजाओं को नमस्कार है एवं शत्रु - संहारक आपके धनुष को नमस्कार है
अर्थ: हे रुद्र हमारे बडों को मत मारो हमारे बच्चों को मत मारो हमारे तरुणों को मत मारो हमारे भ्रूणों को मत मारो हमारे पिताओं की हिंसा करो   हमारी माताओं की हिंसा करो
अर्थ: हे रुद्र हमारे पुत्रों पर और हमारे पौत्रों पर क्रोध करें हमारी गायों पर और हमारे घोडों पर क्रोध करें हमारे क्रोधयुक्त वीरों को मारें हम  निरन्तर यज्ञार्थ आपका आवाहन करते हैं।
रूद्र-सूक्त का पाठ पूरा हो जाने पर भगवान शिव की आरती और क्षमा याचना के पश्चात कलश का जल सारे घर में छिड़क दें।  थोड़ा सा जल स्वयं पी लें और मिश्री प्रसाद के रूप में खाएं, घर में भी मिश्री प्रसाद  सभी को दें।
भगवान शिव सबका कल्याण करें हर हर महादेव









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