वासुकि कालसर्प योग का फल व निवारण और सावधानियां

वासुकि कालसर्प योग का फल  
वासुकि कालसर्प तीसरे भाव में राहु और नौवे भाव में केतु के मध्य स्थित ग्रहों के कारण बनता है।   इस योग से जातक दीर्घायु, निडर और वफादार दोस्त तथा शत्रुओं पर विजय पाने वाला होता है। जातक बड़े-बड़े कार्यों को आसानी से करने में सक्षम होता है, लेकिन फिर भी इस योग से पीड़ित होने पर जातक का जीवन संघर्षमय रहता है भाई-बहन कष्ट भोगते हैं, और नौकरी एवं व्यवसाय में भी परेशानी बनी रहती है. व्यक्ति को भाग्य का साथ नहीं मिल पाता है परिजनों एवं मित्रों से धोखा मिलने की संभावना रहती है I  यह सब सहता हुआ भी जातक अपने माता, पिता एवं परिवार के अन्य कई सदस्यों का खर्चा उठाता है और उनके भरण पोषण का सारा दायित्व निभाता है। जातक अच्छे कर्म करता हुआ भी तथा सबकी भलाई करते हुए भी बुराई पाता है, जातक को धोखा मिलने की संभावना अधिक होती है,फिर भी जातक सबके सहयोग के लिए सदा सबके साथ खड़ा रहता है।

वासुकि कालसर्प योग का निवारण
चने की दाल नदी अथवा तालाब में प्रवाहित क।
शरीर पर सोना धारण करे।
महामृत्युंजय का जाप कराएं।
शिव का रुद्राभिषेक अवश्य किया करें।
नागपंचमी के अवसर पर व्रत रखें नाग देवता की आराधना अवश्य करें।
सरस्वती माता की पूजा प्रतिदिन करें

वासुकि कालसर्प योग के क्या करें क्या करें
किसी को उधार दें।
अतिरिक्त हौसले का प्रदर्शन करें।
बेकार के तंत्र-मंत्र या रहस्यमय बातों से दूर रहें।
दूसरों की सलाह पर बिना सोचे समझे निवेश करें ।  
घर में कभी भी हाथी दांत या हाथीदांत की वस्तुएं रखें।

कालसर्प दोष दूर करने के लिए श्री लिंगाष्टकम का पाठ
कालसर्प के दोष को कम करने के लिये तथा बुरे प्रभाव को दूर करने के लिए भगवान शिव को प्रसन्न करना आवश्यक है और भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए नित्य प्रतिदिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। उसके बाद अपना मुंह पूर्व दिशा में रखें और कुशा या कपड़े के आसन पर बैठ जाएं। और पहले गाय के घी का दिया जलाएं और एक कलश में शुद्ध जल भरकर रखें। और मिश्री प्रसाद रखें। तत्पश्चात भगवान शिव की धूप, दीप , फल , फूल , बेलपत्र आदि से पूजा करें और श्री लिंगाष्टकम का पाठ करें।

श्री लिंगाष्टकम
ब्रह्ममुरारि सुरार्चित लिंगम्   निर्मलभासित शोभित लिंगम्।
जन्मज दुःख विनाशक लिंगम्   तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् 1
देवमुनि प्रवरार्चित लिंगम् ,  कामदहन करुणाकर लिंगम्।
रावणदर्प विनाशन लिंगम्, तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥2॥
सर्वसुगन्धि सुलेपित लिंगम्  बुद्धि विवर्धन कारण लिंगम्।
सिद्ध सुरासुर वन्दित लिङ्गम्  तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥3॥
कनक महामणि भूषित लिंगम्, फणिपति वेष्टित शोभित लिंगम् ।
दक्ष सुयज्ञ विनाशन लिंगम्, तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥4॥
कुंकुम चन्दन लेपित लिंगम्, पंकज हार सुशोभित लिंगम् ।
सञ्चित पाप विनाशन लिंगम्, तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥5॥
देवगणार्चित सेवित लिंगम्, भावैर्भक्तिभिरेव च लिंगम्।
दिनकर कोटि प्रभाकर लिंगम्, तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥6॥
अष्टदलो परिवेष्टित लिंगम्, सर्व समुद्भव कारण लिंगम्।
अष्टदरिद्र विनाशित लिंगम्, तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥7॥
सुरगुरु सुरवर पूजित लिंगम्, सुरवन पुष्प सदार्चित लिंगम्।
परात्परं परमात्मक लिंगम्, तत् प्रणमामि सदाशिवलिंगम् ॥8॥
लिंगाष्टकमिदं पुण्यं यःपठेत् शिवसन्निधौ। शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥

श्री लिंगाष्टकम संपूर्ण

जो लोग संस्कृत नहीं पढ़ सकते हैं, अथवा शुद्ध नहीं पढ़ पाते त्रुटि के साथ पढ़ते हैं, उनके लिए श्री लिंगाष्टकम हिंदी में दे रहे हैं, ताकि आप बिना किसी त्रुटि के आसानी से श्री लिंगाष्टकम का पाठ कर सके ।

                                 श्री लिंगाष्टकम का हिंदी  में अर्थ                 
लिंगाष्टकम भगवान भोलेनाथ के लिंगस्वरूप की स्तुति कर भोलेनाथ करने का उत्तम अष्टक है, जो कोई भक्त पूर्ण आस्था तथा श्रृद्धा सहित भोले बाबा के लिंगाष्टकम का पाठ करेगा उसकी सभी मनोकामना तथा इच्छाओं की पूर्ति स्वयं शिव शंकर करते हैं, श्री लिंगाष्टकम अर्थ सहित इस प्रकार है 

श्लोक (1)-:  जो ब्रह्मा, विष्णु और सभी देवगणों के इष्टदेव हैं, जो परम पवित्र, निर्मल, तथा सभी जीवों की मनोकामना को पूर्ण करने वाले हैं और जो लिंग के रूप में चराचर जगत में स्थापित हुए हैं, जो संसार के संहारक है 

श्लोक (2)-: भगवान सदाशिव जो मुनियों और देवताओं के परम आराध्य देव हैं, तथा देवो और मुनियों द्वारा पूजे जाते हैं, जो काम (वह कर्म जिसमे विषयासक्ति हो) का विनाश करते हैं, जो दया और करुना के सागर है तथा जिन्होंने लंकापति रावन के अहंकार का विनाश किया था, ऐसे परमपूज्य महादेव के लिंग रूप को मैं कोटि-कोटि प्रणाम करता हूँ 

श्लोक (3)-: लिंगमय स्वरूप जो सभी तरह के सुगन्धित इत्रों से लेपित है, और जो बुद्धि तथा आत्मज्ञान में वृद्धि का कारण है, शिवलिंग जो सिद्ध मुनियों और देवताओं और दानवों सभी के द्वारा पूजा जाता है, ऐसे अविनाशी लिंग स्वरुप को प्रणाम है 

श्लोक (4)-: लिंगरुपी आशुतोष जो सोने तथा रत्नजडित आभूषणों से सुसज्जित है, जो चारों ओर से सर्पों से घिरे हुए है, तथा जिन्होंने प्रजापति दक्ष (माता सती के पिता) के यज्ञ का विध्वस किया था, ऐसे लिंगस्वरूप श्रीभोलेनाथ को बारम्बार प्रणाम 

श्लोक (5)-: देवों के देव जिनका लिंगस्वरुप कुंकुम और चन्दन से सुलेपित है और कमल के सुंदर हार से शोभायमान है, तथा जो संचित पापकर्म का लेखा-जोखा मिटने में सक्षम है, ऐसे आदि-अन्नत भगवान शिव के लिंगस्वरूप को मैं नमन करता हूँ 

श्लोक (6)-: जो सभी देवताओं तथा देवगणों द्वारा पूर्ण श्रृद्धा एवं भक्ति भाव से परिपूर्ण तथा पूजित है, जो हजारों सूर्य के समान तेजस्वी है, ऐसे लिंगस्वरूप भगवान शिव को प्रणाम है 

श्लोक (7)-: भावार्थः- जो पुष्प के आठ दलों (कलियाँ) के मध्य में विराजमान है, जो सृष्टि में सभी घटनाओं (उचित-अनुचित) के रचियता हैं, और जो आठों प्रकार की दरिद्रता का हरण करने वाले ऐसे लिंगस्वरूप भगवान शिव को मैं प्रणाम करता हूँ 

श्लोक (8)-: भावार्थः- जो देवताओं के गुरुजनों तथा सर्वश्रेष्ठ देवों द्वारा पूजनीय है, और जिनकी पूजा दिव्य-उद्यानों के पुष्पों से कि जाती है, तथा जो परमब्रह्म है जिनका आदि है और ही अंत है ऐसे अनंत अविनाशी लिंगस्वरूप भगवान भोलेनाथ को मैं सदैव अपने ह्रदय में स्थित कर प्रणाम करता हूँ 

जो कोई भी इस लिंगाष्टकम को शिव या शिवलिंग के समीप श्रृद्धा सहित पाठ करेगा उसको शिवलोक प्राप्त होता है तथा भगवान भोलेनाथ उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते है 

श्री लिंगाष्टकम समाप्त 

श्री लिंगाष्टकम का पाठ पूरा हो जाने पर भगवान शिव की आरती और क्षमा याचना के पश्चात कलश का जल सारे घर में छिड़क दें।  थोड़ा सा जल स्वयं पी लें और मिश्री प्रसाद के रूप में खाएं, घर में भी मिश्री प्रसाद  सभी को दें ॥ 

॥ भगवान शिव सबका कल्याण करें हर हर महादेव ॥



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