शंखपाल कालसर्प योग का फल व निवारण और सावधानियां

शंखपाल काल सर्प योग का फल
शंखपाल कालसर्प योग चतुर्थ भाव में राहु और दशम भाव में केतु के मध्य स्थित अन्य समस्त ग्रह इस दोष का कारण बनते हैं। इस योग से पीड़ित होने पर जातक को शिक्षा प्राप्ति में बाधाएं आती हैं एवं शिक्षा पूर्ण नहीं होती। नौकरी एवं व्यवसाय में उतार-चढ़ाव का आते रहते है। आंर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता है, धन-धान्य, सुख-समृद्धि तथा चल-अचल संपत्ति में कमी आती है। पैतृक संपत्ति प्राप्त करने में व्यवधान उपस्थित होते हैं। मानसिक तनाव भी झेलना पडता है. अपनी मां, ज़मीन, परिजनों के मामले में कष्ट भोगना पड़ता है. प्रायः भाई, बहन, माता तथा नौकर-चाकरों द्वारा व्यवधान, परेशानी और बाधाएं आती रहती हैं। स्वास्थ्य प्रायः बिगड़ा रहता है। पेट अथवा किडनी सम्बन्धी व्याधियॉ होती हैं।  अपने परिजनों की कृपा पर आश्रित ऐसे व्यक्ति नकारात्मक विचारों से त्रस्त रहते हैं, ऐसे व्यक्ति अपनी उपलब्धियों से असंतुष्ट होकर दूसरों के एहसानों के नीचे दबे रहते हैं जीवन यापन करने के लिए कर्ज लेने तक की स्थिति बन जाती है  लेकि अपने जन्म स्थान से दूर रहने पर ऐसे व्यक्तियों का भाग्योदय भी हो जाता है।

शंखपाल काल सर्प योग का निवारण
महामृत्युंजय का जाप कराएं।
नाग पंचमी के दिन भगवान शिव का सामर्थ्य और श्रद्धा भाव से अभिषेक किया करें।
किसी निःस्वार्थ भाव से चल रहे भंडारे में भोजन बनाने के प्रयोजन से दान कर दिया करें।
शरीर पर चांदी धारण करें।
400 ग्राम धनिया या बादाम दान करें अथवा दोनो को पानी में बहाएं।
सरस्वती माता की पुजा करें।  
चांदी की डिब्बी में शहद भरकर घर के बाहर ज़मीन में दबाये.

वासुकि कालसर्प योग के क्या करें क्या करें
घर के पुराने शौचालय में टूट-फूट ना कराएं।
जमीन के अंदर पानी की टंकी ना बनवाएं।
घर की छत में काम ना कराएं ।
आटा, चीनी आदि की बोरियाँ इकट्ठी ना करें।
माता का अपमान करने से बचें। 
शराब मांस आदि का भक्षण न करें

कालसर्प के दोष को कम करने के लिये रुद्राष्टक का पाठ 
कालसर्प के दोष को कम करने के लिये तथा बुरे प्रभाव को दूर करने के लिए भगवान शिव को प्रसन्न करना आवश्यक है और भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए नित्य प्रतिदिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। उसके बाद अपना मुंह पूर्व दिशा में रखें और कुशा या कपड़े के आसन पर बैठ जाएं। और पहले गाय के घी का दिया जलाएं और एक कलश में शुद्ध जल भरकर रखें। और मिश्री प्रसाद रखें। तत्पश्चात भगवान शिव की धूप, दीप , फल , फूल , बेलपत्र आदि से पूजा करें और  रुद्राष्टक का पाठ करें।
रुद्राष्टक प्रारंभ
नमामीशमीशान निर्वाण रूपं, विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदः स्वरूपम्
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं, चिदाकाश माकाशवासं भजेऽहम्1
निराकार मोंकार मूलं तुरीयं, गिराज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम्
करालं महाकाल कालं कृपालुं, गुणागार संसार पारं नतोऽहम्2
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं, मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरम्
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारू गंगा, लसद्भाल बालेन्दु कण्ठे भुजंगा॥3
चलत्कुण्डलं शुभ्र नेत्रं विशालं, प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्
मृगाधीश चर्माम्बरं मुण्डमालं, प्रिय शंकरं सर्वनाथं भजामि 4
प्रचण्डं प्रकष्टं प्रगल्भं परेशं, अखण्डं अजं भानु कोटि प्रकाशम्
त्रयशूल निर्मूलनं शूल पाणिं, भजेऽहं भवानीपतिं भाव गम्यम्5
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी, सदा सच्चिनान्द दाता पुरारी।
चिदानन्द सन्दोह मोहापहारी, प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी 6
यावद् उमानाथ पादारविन्दं, भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्
तावद् सुखं शांति सन्ताप नाशं, प्रसीद प्रभो सर्वं भूताधि वासं 7
जानामि योगं जपं नैव पूजा, तोऽहम्सदा सर्वदा शम्भू तुभ्यम्
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं, प्रभोपाहि आपन्नामामीश शम्भो 8
रूद्राष्टकं इदं प्रोक्तं विप्रेण हर्षोतये, ये पठन्ति नरा भक्तयां तेषां शंभो प्रसीदति
  रुद्राष्टक संपूर्ण

जो लोग संस्कृत नहीं पढ़ सकते हैं , अथवा शुद्ध नहीं पढ़ पाते त्रुटि के साथ पढ़ते हैं उनके लिए रुद्राष्टक हिंदी में दे रहे हैं, ताकि आप बिना किसी त्रुटि के आसानी से रुद्राष्टक का पाठ कर सके

                                                 रुद्राष्टक का हिंदी  में अर्थ

1-; हे भगवन ईशान को मेरा प्रणाम ऐसे भगवान जो कि निर्वाण रूप हैं जो कि महान के दाता हैं जो सम्पूर्ण ब्रह्माण में व्यापत हैं जो अपने आपको धारण किये हुए हैं जिनके सामने गुण अवगुण का कोई महत्व नहीं, जिनका कोई विकल्प नहीं, जो निष्पक्ष हैं जिनका आकार आकाश के समान हैं जिसे मापा नहीं जा सकता उनकी मैं उपासना करता हूँ 

2-; जिनका कोई आकार नहीं, जो के मूल हैं, जिनका कोई राज्य नहीं, जो गिरी के वासी हैं, जो कि सभी ज्ञान, शब्द से परे हैं, जो कि कैलाश के स्वामी हैं, जिनका रूप भयावह हैं, जो कि काल के स्वामी हैं, जो उदार एवम् दयालु हैं, जो गुणों का खजाना हैं, जो पुरे संसार के परे हैं उनके सामने मैं नत मस्तक हूँ 

3-; जो कि बर्फ के समान शील हैं, जिनका मुख सुंदर हैं, जो गौर रंग के हैं जो गहन चिंतन में हैं, जो सभी प्राणियों के मन में हैं, जिनका वैभव अपार हैं, जिनकी देह सुंदर हैं, जिनके मस्तक पर तेज हैं जिनकी जटाओ में लहलहारती गंगा हैं, जिनके चमकते हुए मस्तक पर चाँद हैं, और जिनके कंठ पर सर्प का वास हैं 

4-; जिनके कानों में बालियाँ हैं, जिनकी सुन्दर भौंहें और बड़ी-बड़ी आँखे हैं जिनके चेहरे पर सुख का भाव हैं जिनके कंठ में विष का वास हैं जो दयालु हैं, जिनके वस्त्र शेर की खाल हैं, जिनके गले में मुंड की माला हैं ऐसे प्रिय शंकर पुरे संसार के नाथ हैं उनको मैं पूजता हूँ 

5-; जो भयंकर हैं, जो परिपक्व साहसी हैं, जो श्रेष्ठ हैं अखंड है जो अजन्मे हैं जो सहस्त्र सूर्य के सामान प्रकाशवान हैं जिनके पास त्रिशूल हैं जिनका कोई मूल नहीं हैं जिनमे किसी भी मूल का नाश करने की शक्ति हैं ऐसे त्रिशूल धारी माँ भगवती के पति जो प्रेम से जीते जा सकते हैं उन्हें मैं वन्दन करता हूँ 

6-; जो काल के बंधे नहीं हैं, जो कल्याणकारी हैं, जो विनाशक भी हैं,जो हमेशा आशीर्वाद देते है और धर्म का साथ देते हैं , जो अधर्मी का नाश करते हैं, जो चित्त का आनंद हैं, जो जूनून हैं जो मुझसे खुश रहे ऐसे भगवान जो कामदेव नाशी हैं उन्हें मेरा प्रणाम 

7-; जो यथावत नहीं हैं, ऐसे उमा पति के चरणों में कमल वन्दन करता हैं ऐसे भगवान को पूरे लोक के नर नारी पूजते हैं, जो सुख हैं, शांति हैं, जो सारे दुखो का नाश करते हैं जो सभी जगह वास करते हैं 

8-; मैं कुछ नहीं जानता, ना योग, जप ही पूजा, हे देव मैं आपके सामने अपना मस्तक हमेशा झुकाता हूँ, सभी संसारिक कष्टों, दुःख दर्द से मेरी रक्षा करे. मेरी बुढ़ापे के कष्टों से से रक्षा करें , मैं सदा ऐसे शिव शम्भु को प्रणाम करता हूँ ॥  

                   श्री रुद्राष्टक समाप्त  

रुद्राष्टक का पाठ पूरा हो जाने पर भगवान शिव की आरती और क्षमा याचना के पश्चात कलश का जल सारे घर में छिड़क दें।  थोड़ा सा जल स्वयं पी लें और मिश्री प्रसाद के रूप में खाएं, घर में भी मिश्री प्रसाद  सभी को दें।

॥ भगवान शिव सबका कल्याण करें हर हर महादेव ॥








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