महापद्म कालसर्प योग का फल व निवारण और सावधानियां

महापद्म कालसर्प योग
महापद्म कालसर्प योग छठे में राहु और द्वादश भाव में केतु के मध्य स्थित अन्य समस्त ग्रह आने के कारण बनता है।, इस योग के प्रभाव के कारण जातक को बहुत से अनचाहे तथा अनुचित खर्चों का सामना करना पड़ता है, जातक को मामा की तरफ से कष्ट होता है, जातक के बहुत सारे दुश्मन होते हैं लेकिन जातक अपने दुश्मनों को पहचानने में सक्षम नहीं होता और जातक के दुश्मन मित्र बनकर जातक को धोखा देते हैं, उसके धन को खराब करते हैं और जातक जिसके लिए भी भलाई का कार्य करेगा उसी से जातक को बुराई मिलती है जातक अपनी आजीविका चलाने के लिए तथा अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए बहुत सारी योजनाएं बनाता है और उन योजनाओं में धन खर्च करता है जिसके फलस्वरूप इन योजनाओं अधिकांश धन बर्बाद हो जाता है और जातक कर्ज की स्थिति में जाता है, जातक के द्वारा बनाई हुई योजनाएं ही जातक को के धन को खराब करती है जातक को काफी समय तक शारीरिक कष्ट भोगना पड़ता है. प्रेम के मामलें में ऐसे जातक दुर्भाग्यशाली होते हैं. और मानसिक कष्ट भोगते हैं इस योग से पीड़ित होने पर जातक को निराशा हताशा के कारण आप व्यस्नों का आधीन हो जाते है।  
महापद्म कालसर्प योग का निवारण
महामृत्युंजय का जाप कराएं।
अपनी जेब में काला सुरमा रखें।
सरस्वती माता की पुजा करें।  
घर में कुत्ता पालें अथवा प्रतिदिन कुत्तों को भोजन कराएं
बहन बुआ बेटी को कुछ ना कुछ उपहार में अवश्य देते रहना चाहिए।
श्रावण मास में 30 दिन तक दूध एवं जल से शिव जी का अभिषेक करना चाहिए।
नाग पंचमी के दिन रुद्राभिषेक तथा राहु केतु की पूजा हवन अवश्य कराना चाहिए।

महापद्म कालसर्प योग के जातक क्या करें,क्या  करें
धोखे और फरेब से बचें।
भाइयों से अच्छे संबंध रखें।
धर्म-कर्म के कामों में रुचि रखें
शराब, मांशाहार, अण्डे के सेवन से बचें।  
बेवजह और अत्यधिक क्रोध का त्याग करें
भाइयों / बहनों को कभी नुकसान न पहुंचाएं। 

कालसर्प के दोष को कम करने के लिये शिव तांडव स्तोत्र
कालसर्प के दोष को कम करने के लिये तथा बुरे प्रभाव को दूर करने के लिए भगवान शिव को प्रसन्न करना आवश्यक है और भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए नित्य प्रतिदिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। उसके बाद अपना मुंह पूर्व दिशा में रखें और कुशा या कपड़े के आसन पर बैठ जाएं। और पहले गाय के घी का दिया जलाएं और एक कलश में शुद्ध जल भरकर रखें। और मिश्री प्रसाद रखें। तत्पश्चात भगवान शिव की धूप, दीप , फल , फूल , बेलपत्र आदि से पूजा करें और शिव तांडव स्तोत्रं का पाठ करें।

शिव तांडव स्तोत्रं प्रारंभ  
जटाटवीगलज्जल प्रवाहपावितस्थले , गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्
डमड्डमड्डमड्डमनिनादवड्डमर्वयं, चकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम 1

जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी , विलोलवी चिवल्लरी विराजमानमूर्धनि
धगद्धगद्ध गज्ज्वलल्ललाट पट्टपावके, किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं 2

धरा धरेंद्र नंदिनी विलास बंधुवंधुर , स्फुरदृगंत संतति प्रमोद मानमानसे
कृपाकटा क्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदि, कवचिद्विगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि 3

जटा भुजं गपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा , कदंबकुंकुम द्रवप्रलिप्त दिग्वधूमुखे
मदांध सिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे, मनो विनोदद्भुतं बिंभर्तु भूतभर्तरि 4

सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर, प्रसून धूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः
भुजंगराज मालया निबद्धजाटजूटकः, श्रिये चिराय जायतां चकोर बंधुशेखरः 5

ललाट चत्वरज्वलद्धनंजयस्फुरिगभा-, निपीतपंचसायकं निमन्निलिंपनायम्
सुधा मयुख लेखया विराजमानशेखरं, महा कपालि संपदे शिरोजयालमस्तू नः 6

कराल भाल पट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-, द्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके
धराधरेंद्र नंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक, प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम 7

नवीन मेघ मंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर, त्कुहु निशीथिनीतमः प्रबंधबंधुकंधरः
निलिम्पनिर्झरि धरस्तनोतु कृत्ति सिंधुरः, कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः 8

प्रफुल्ल नील पंकज प्रपंचकालिमच्छटा, विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं, गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे 9

अगर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी, रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं, गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे 10

जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुर, द्धगद्धगद्वि निर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्
धिमिद्धिमिद्धिमि नन्मृदंगतुंगमंगल, ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः 11

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंग मौक्तिकमस्रजो, र्गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः, समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे 12

कदा निलिंपनिर्झरी निकुजकोटरे वसन्‌, विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः, शिवेति मंत्रमुच्चरन्कदा सुखी भवाम्यहम्13

निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका, निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं, परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः 14

प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी, महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः, शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्15

इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं, पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नांयथा गतिं, विमोहनं हि देहना तु शंकरस्य चिंतनम 16

पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं, यः शम्भूपूजनमिदं पठति प्रदोषे
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां, लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः 17
इति शिव तांडव स्तोत्रं संपूर्णम् 

जो लोग संस्कृत नहीं पढ़ सकते हैं , अथवा शुद्ध नहीं पढ़ पाते त्रुटि के साथ पढ़ते हैं उनके लिए शिव तांडव स्तोत्र हिंदी में दे रहे हैं, ताकि आप बिना किसी त्रुटि के आसानी से शिव तांडव स्तोत्र का पाठ कर सके
                         शिव तांडव स्तोत्र का हिंदी  में अर्थ
1-:  जिन शिव जी की सघन, वनरूपी जटा से प्रवाहित हो गंगा जी की धाराएँ उनके कंठ को प्रक्षालित करती हैं, जिनके गले में बड़े एवं लम्बे सर्पों की मालाएं लटक रहीं हैं, तथा जो शिव जी डम-डम डमरू बजा कर प्रचण्ड ताण्डव करते हैं, वे शिवजी हमारा कल्याण करें।

2-:  जिन शिव जी की जटाओं में अतिवेग से विलास पूर्वक भ्रमण कर रही देवी गंगा की लहरें उनके शीश पर लहरा रहीं हैं, जिनके मस्तक पर अग्नि की प्रचण्ड ज्वालायें धधक-धधक करके प्रज्वलित हो रहीं हैं, उन बाल चंद्रमा से विभूषित शिवजी में मेरा अनुराग प्रतिक्षण बढ़ता रहे।

3-:  जो पर्वतराजसुता (पार्वती जी) के विलासमय रमणीय कटाक्षों में परम आनन्दित चित्त रहते हैं, जिनके मस्तक में सम्पूर्ण सृष्टि एवं प्राणीगण वास करते हैं, तथा जिनकी कृपादृष्टि मात्र से भक्तों की समस्त विपत्तियां दूर हो जाती हैं, ऐसे दिगम्बर (आकाश को वस्त्र सामान धारण करने वाले) शिवजी की आराधना से मेरा चित्त सर्वदा आनन्दित रहे।

4-:  मैं उन शिवजी की भक्ति में आनन्दित रहूँ जो सभी प्राणियों के आधार एवं रक्षक हैं, जिनकी जटाओं में लिपटे सर्पों के फण की मणियों का प्रकाश पीले वर्ण प्रभा-समूह रूप केसर के कान्ति से दिशाओं को प्रकाशित करते हैं और जो गजचर्म से विभूषित हैं।

5-:  जिन शिव जी के चरण इन्द्र-विष्णु आदि देवताओं के मस्तक के पुष्पों की धूल से रंजित हैं (जिन्हें देवतागण अपने सर के पुष्प अर्पण करते हैं), जिनकी जटाओं में लाल सर्प विराजमान है, वो चन्द्रशेखर हमें चिरकाल के लिए सम्पदा दें।

6-:  जिन शिव जी ने इन्द्रादि देवताओं का गर्व दहन करते हुए, कामदेव को अपने विशाल मस्तक की अग्नि ज्वाला से भस्म कर दिया, तथा जो सभी देवों द्वारा पूज्य हैं, तथा चन्द्रमा और गंगा द्वारा सुशोभित हैं, वे मुझे सिद्धि प्रदान करें।

7-:  जिनके मस्तक से धक-धक करती प्रचण्ड ज्वाला ने कामदेव को भस्म कर दिया तथा जो शिव पार्वती जी के स्तन के अग्र भाग पर चित्रकारी करने में अति चतुर हैं (यहाँ पार्वती प्रकृति हैं, तथा चित्रकारी सृजन है), उन शिव जी में मेरी प्रीति अटल हो।

8-: जिनका कण्ठ नवीन मेघों की घटाओं से परिपूर्ण अमावस्या की रात्रि के सामान काला है, जो कि गज-चर्म, गंगा एवं बाल-चन्द्र द्वारा शोभायमान हैं तथा जो जगत का बोझ धारण करने वाले हैं, वे शिव जी हमे सभी प्रकार की सम्पन्नता प्रदान करें।

9-: जिनका कण्ठ और कन्धा पूर्ण खिले हुए नीलकमल की फैली हुई सुन्दर श्याम प्रभा से विभूषित है, जो कामदेव और त्रिपुरासुर के विनाशक, संसार के दुःखों को काटने वाले, दक्षयज्ञ विनाशक, गजासुर एवं अन्धकासुर के संहारक हैं तथा जो मृत्यू को वश में करने वाले हैं, मैं उन शिव जी को भजता हूँ।

10-: जो कल्याणमय, अविनाशी, समस्त कलाओं के रस का आस्वादन करने वाले हैं, जो कामदेव को भस्म करने वाले हैं, त्रिपुरासुर, गजासुर, अन्धकासुर के संहारक, दक्षयज्ञ विध्भंसक तथा स्वयं यमराज के लिए भी यमस्वरूप हैं, मैं उन शिव जी को भजता हूँ।

11-:  अत्यंत वेग से भ्रमण कर रहे सर्पों के फूफकार से क्रमश: ललाट में बढ़ी हूई प्रचण्ड अग्नि के मध्य मृदंग की मंगलकारी उच्च धिम-धिम की ध्वनि के साथ ताण्डव नृत्य में लीन शिव जी सर्व प्रकार सुशोभित हो रहे हैं।

12-:   कठोर पत्थर एवं कोमल शय्या, सर्प एवं मोतियों की मालाओं, बहुमूल्य रत्न एवं मिट्टी के टुकड़ों, शत्रु एवं मित्रों, राजाओं तथा प्रजाओं, तिनकों तथा कमलों पर समान दृष्टि रखने वाले शिव को मैं भजता हूँ।

13-:  कब मैं गंगा जी के कछारगुञ में निवास करता हुआ, निष्कपट हो, सिर पर अंजलि धारण कर चंचल नेत्रों तथा ललाट वाले शिव जी का मंत्रोच्चार करते हुए अक्षय सुख को प्राप्त करूंगा

14-:   देवांगनाओं के सिर में गुंथे पुष्पों की मालाओं से झड़ते हुए सुगंधमय राग से मनोहर परम शोभा के धाम महादेव जी के अंगों की सुन्दरता परमानन्दयुक्त हमारे मन की प्रसन्नता को सर्वदा बढ़ाती रहे।

15-: प्रचण्ड वडवानल की भांति पापों को भस्म करने में स्त्री स्वरूपिणी अणिमादिक अष्टमहासिध्दियों तथा चंचल नेत्रों वाली कन्याओं से शिव विवाह समय गान की मंगलध्वनि सब मंत्रों में परमश्रेष्ठ शिव मंत्र से पूरित, संसारिक दुःखों को नष्ट कर विजय पायें।

16-:  इस उत्तमोत्तम शिव ताण्डव स्तोत्र को नित्य पढ़ने या श्रवण करने मात्र से प्राणी पवित्र हो, परमगुरु शिव में स्थापित हो जाता है तथा सभी प्रकार के भ्रमों से मुक्त हो जाता है।

17-: प्रात: शिवपूजन के अंत में इस रावणकृत शिवताण्डवस्तोत्र के गान से लक्ष्मी स्थिर रहती हैं तथा भक्त रथ, गज, घोड़े आदि सम्पदा से सर्वदा युक्त रहता है।
  
 शिव तांडव स्तोत्र समाप्त
शिव तांडव स्तोत्र का पाठ पूरा हो जाने पर भगवान शिव की आरती और क्षमा याचना के पश्चात कलश का जल सारे घर में छिड़क दें।  थोड़ा सा जल स्वयं पी लें और मिश्री प्रसाद के रूप में खाएं, घर में भी मिश्री प्रसाद  सभी को दें।              
        ॥ भगवान शिव सबका कल्याण करें हर हर महादेव ॥







 

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