पद्म कालसर्प योग पांचवे भाव में राहु और एकादश भाव में केतु के मध्य स्थित अन्य समस्त ग्रह आने के कारण बनता है। इस योग से पीड़ित होने पर जातक को यौन रोग के कारण संतान सुख मिलना कठिन हो जाता है. यदि सन्तान हो भी जाए तो उसके स्वास्थ्य एवं अन्य विषयो को लेकर जातक को चिंताएं घेरी रहती हैं, मन में किसी अनहोनी घटना का भय बना रहता, उच्च शिक्षा में बाधा आती हैं, जातक का अध्यन में मन नहीं लगता अथवा याद नहीं रहता है | धन लाभ में कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है, तथा रोजी-रोटी का जुगाड़ भी बड़ी मुश्किल से हो पाता है। इस योग का प्रभाव से वृद्धावस्था में कभी कभी सन्यास की प्रवृती भी मन में आने लगती हैं, जातक के स्वस्थ्य में अक्सर उतार चढाव रह सकता है, पेट की व्याधियॉ सताती हैं अथवा इनको लाइलाज बीमारियां घेर लेती है जो ठीक होने में लंबा समय लेती है तथा जातक अपनी आजीविका प्राप्त करने के लिए अनुचित और अनावश्यक कार्य में यह धन व्यर्थ कर देता हैं।
घर में चांदी का ठोस हाथी रखे
नित्य सरस्वती स्तोत्र का पाठ करें।
महामृत्युंजय का जाप कराएं।
अपने पितरों की पूजा अवश्य करें क्या कराएं
माता का ध्यान रखें और शनि तथा शुक्र का उपाय करें।
राहु की पूजा शिव मंदिर में रात में या राहुकाल में करें।
घर के चौखट के नीचे चांदी का पत्तर रखना लाभदायक होता है.
राहु ग्रह से सम्बन्धित वस्तुएं जैसे शीशा, कंबल, तिल, ज्वर, बाजरा दान करें।.
माह में एक बार आद्रा व स्वाती नक्षत्र में शिव का रुद्राभिषेक अवश्य किया करें।
श्री लिंगाष्टकम
कालसर्प दोष के दुष्प्रभावों को कम करने के लिये तथा जीवन में सकारात्मक स्थिति प्राप्त करने के लिए नित्य प्रतिदिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ स्वच्छ और शुद्ध वस्त्र धारण करें । उसके बाद अपना मुंह पूर्व दिशा में रखें और कुशा या कपड़े के आसन पर बैठ जाएं। औरपहले गाय के घी का दिया जलाएं और एक लोटे में शुद्ध जलभरकर रखें। और मिश्री का प्रसाद रखें। तत्पश्चात भगवान शिव के समक्ष धूप, दीप प्रज्वलित करके रखे तत्पश्चात, फल, फूल, बेलपत्र आदि के द्वारा पूजा करें और शिव चालीसा का पाठ 3,5,11 या फिर 40 बार करें।
श्री लिंगाष्टकम
ब्रह्ममुरारि सुरार्चित लिंगम् निर्मलभासित शोभित लिंगम्।
जन्मज दुःख विनाशक लिंगम् तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥1॥
देवमुनि प्रवरार्चित लिंगम् , कामदहन करुणाकर लिंगम्।
रावणदर्प विनाशन लिंगम्, तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥2॥
सर्वसुगन्धि सुलेपित लिंगम् बुद्धि विवर्धन कारण लिंगम्।
सिद्ध सुरासुर वन्दित लिङ्गम् तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥3॥
कनक महामणि भूषित लिंगम्, फणिपति वेष्टित शोभित लिंगम् ।
दक्ष सुयज्ञ विनाशन लिंगम्, तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥4॥
कुंकुम चन्दन लेपित लिंगम्, पंकज हार सुशोभित लिंगम् ।
सञ्चित पाप विनाशन लिंगम्, तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥5॥
देवगणार्चित सेवित लिंगम्, भावैर्भक्तिभिरेव च लिंगम्।
दिनकर कोटि प्रभाकर लिंगम्, तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥6॥
अष्टदलो परिवेष्टित लिंगम्, सर्व समुद्भव कारण लिंगम्।
अष्टदरिद्र विनाशित लिंगम्, तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥7॥
सुरगुरु सुरवर पूजित लिंगम्, सुरवन पुष्प सदार्चित लिंगम्।
परात्परं परमात्मक लिंगम्, तत् प्रणमामि सदाशिवलिंगम् ॥8॥
लिंगाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत् शिवसन्निधौ । शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥
श्री लिंगाष्टकम संपूर्ण
श्री लिंगाष्टकम हिंदी में प्रारंभ
जो श्रद्धालु जन शिव पंचाक्षर स्तोत्र को संस्कृत में नहीं पढ़ सकते हैं अथवा शुद्ध नहीं पढ़ पाते त्रुटि के साथ पढ़ते हैं तो उन सब के लिए शिव पंचाक्षर स्तोत्र हिंदी में दिया जा रहा है ताकि आप बिना किसी त्रुटि के शुद्धता भगवान शिव के इस पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ कर सके।
श्री लिंगाष्टकम का हिंदी में अर्थ
लिंगाष्टकम भगवान भोलेनाथ के लिंगस्वरूप की स्तुति कर भोलेनाथ करने का उत्तम अष्टक है, जो कोई भक्त पूर्ण आस्था तथा श्रृद्धा सहित भोले बाबा के लिंगाष्टकम का पाठ करेगा उसकी सभी मनोकामना तथा इच्छाओं की पूर्ति स्वयं शिव शंकर करते हैं, श्री शिव लिंगाष्टकम अर्थ सहित इस प्रकार है:-
1 भावार्थः- जो ब्रह्मा, विष्णु और सभी देवगणों के इष्टदेव हैं, जो परम पवित्र, निर्मल, तथा सभी जीवों की मनोकामना को पूर्ण करने वाले हैं और जो लिंग के रूप में चराचर जगत में स्थापित हुए हैं, जो संसार के संहारक है
॥2॥ भावार्थः- भगवान सदाशिव जो मुनियों और देवताओं के परम आराध्य देव हैं, तथा देवो और मुनियों द्वारा पूजे जाते हैं, जो काम (वह कर्म जिसमे विषयासक्ति हो) का विनाश करते हैं, जो दया और करुना के सागर है तथा जिन्होंने लंकापति रावन के अहंकार का विनाश किया था, ऐसे परमपूज्य महादेव के लिंग रूप को मैं कोटि-कोटि प्रणाम करता हूँ ।
॥3॥ भावार्थः- लिंगमय स्वरूप जो सभी तरह के सुगन्धित इत्रों से लेपित है, और जो बुद्धि तथा आत्मज्ञान में वृद्धि का कारण है, शिवलिंग जो सिद्ध मुनियों और देवताओं और दानवों सभी के द्वारा पूजा जाता है, ऐसे अविनाशी लिंग स्वरुप को प्रणाम है ।
॥4॥ भावार्थः- लिंगरुपी आशुतोष जो सोने तथा रत्नजडित आभूषणों से सुसज्जित है, जो चारों ओर से सर्पों से घिरे हुए है, तथा जिन्होंने प्रजापति दक्ष (माता सती के पिता) के यज्ञ का विध्वस किया था, ऐसे लिंगस्वरूप श्रीभोलेनाथ को बारम्बार प्रणाम ।
॥5॥ भावार्थः- देवों के देव जिनका लिंगस्वरुप कुंकुम और चन्दन से सुलेपित है और कमल के सुंदर हार से शोभायमान है, तथा जो संचित पापकर्म का लेखा-जोखा मिटने में सक्षम है, ऐसे आदि-अन्नत भगवान शिव के लिंगस्वरूप को मैं नमन करता हूँ।
॥6॥ भावार्थः- जो सभी देवताओं तथा देवगणों द्वारा पूर्ण श्रृद्धा एवं भक्ति भाव से परिपूर्ण तथा पूजित है, जो हजारों सूर्य के समान तेजस्वी है, ऐसे लिंगस्वरूप भगवान शिव को प्रणाम है ।
॥7॥ भावार्थः- जो पुष्प के आठ दलों (कलियाँ) के मध्य में विराजमान है, जो सृष्टि में सभी घटनाओं (उचित-अनुचित) के रचियता हैं, और जो आठों प्रकार की दरिद्रता का हरण करने वाले ऐसे लिंगस्वरूप भगवान शिव को मैं प्रणाम करता हूँ ।
॥8॥ भावार्थः- जो देवताओं के गुरुजनों तथा सर्वश्रेष्ठ देवों द्वारा पूजनीय है, और जिनकी पूजा दिव्य-उद्यानों के पुष्पों से कि जाती है, तथा जो परमब्रह्म है जिनका न आदि है और न ही अंत है ऐसे अनंत अविनाशी लिंगस्वरूप भगवान भोलेनाथ को मैं सदैव अपने ह्रदय में स्थित कर प्रणाम करता हूँ |
भावार्थः- जो कोई भी इस लिंगाष्टकम को शिव या शिवलिंग के समीप श्रृद्धा सहित पाठ करेगा उसको शिवलोक प्राप्त होता है तथा भगवान भोलेनाथ उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते है ।
