शंखचूड़ कालसर्प योग का फल व निवारण और सावधानियां

शंखचूड़ कालसर्प योग का फल व निवारण और सावधानियां 

शंखचूड़ कालसर्प योग का फल

शंखचूड़ कालसर्प योग नवम भाव में राहु और तृतीय भाव में केतु के मध्य स्थित अन्य समस्त ग्रह आने के कारण बनता है। शंखचूड़ कालसर्प दोष के विषय में कहा यह जाता है कि यह दोष उस व्यक्ति की कुण्डली में बनता है जिसने अपने पूर्व जन्म के कर्म के प्रायश्चित हेतु पुनर्जन्म लिया हो. इसलिय शंखचूड़ काल सर्प दोष के होने पर जातक के जीवन में पितृ दोष बनाता है क्योंकि कुंडली में नवां घर पित्रों तथा पूर्वजों का घर माना जाता है। जातक भाग्यहीन दुर्भाग्यशाली होता है,तथा उतार-चढ़ाव भरा कठिन जीवन जीता हैं। ऐसा व्यक्ति स्वयं के संघर्ष से ही आगे बढ सकता है, नौकरी और वयवसाय में लगातार असफलता मिल सकती है किसी भी सफलता को पाने के लिए व्यक्ति को एक लम्बे समय तक संघर्ष भी सहना पड़ सकता है, शंखचूड़ कालसर्प योग से पीड़ित होने के कारण बालों में सफेदी आने के साथ ही दुर्भाग्य का दौर प्रारंभ हो जाता है धन खो जाता है या चोरी चला जाता है सिर के बाल उड़ जाते हैं शिक्षा में बाधा आती है , अथवा शिक्षा अधूरी रह जाती है जातक के बारे में निराधार अफवाह फैलती हैं जिससे झूठे अभियोग चलते हैं , जातक को विरोधी पक्ष की ओर से तनाव अधिक झेलना पड़ सकता है निर्दोष होते हुए भी कभी-कभी जेल के कष्ट सहने पड़ते हैं।फिर भी ये जातक अहंकारी भी हो सकते है। और अपने आप में रहने वाले बन सकते हैं ऐसे जातक के शरीर पर चर्बी बढ़ सकती है, और ऐसे जातक अपने अहंकार के कारण अपनों के विरोधी हो सकते हैं
निम्न उपाय के द्वारा आप शंखचूड़ कालसर्प से मिलने वाले अशुभ प्रभाव को कम कर सकते हैं
शंखचूड़ कालसर्प योग का निवारण
महामृत्युंजय का जाप कराएं।
पित्र शांति हेतु पूजा अवश्य कराएं।
चने की दाल बहते पानी में प्रवाहित करे
माथे पर केसर या हल्दी का तिलक लगाएं।
43 दिन तक पीपल के पेड में जल चढाएं और दीपक जलाएँ ।
नाग पंचमी के दिन काल सर्प दोष पूजा कराएं और सवा किलो जौ बहते जल में प्रवाहित करे।
चांदी से निर्मित राहु यंत्र शनिवार के दिन पूजा करा कर के अपने घर में रखे हैं या गले में धारण करें ।
प्रत्येक शनिवार के दिन अपने वजन के बराबर लकड़ी का कोयला चलते पानी में प्रवाहित करना चाहिए।
शंखचूड़ कालसर्प योग के जातक क्या करें,क्या  करें     
ईमानदार बने रहें।
व्यर्थ का सफर करें।
मित्रों से विवाद करें।
भाइयों का ध्यान रखें।
व्यर्थ का झगड़ा मोल लें।
घर में भट्टी न लगाएँ।
रीढ़ संबंधी बीमारी से बचें।
संयुक्त परिवार में ही रहें।
बिना सोचे-समझे दूसरे की सलाह लें।
मकान का प्रवेश द्वार दक्षिण में रखें।
ससुराल पक्ष से संबंध न बिगाड़ें।
दहलीज के नीचे से गंदे पानी की निकासी न करें। 
                                 ॥ शिव चालीसा 
कालसर्प के दोष को कम करने के लिये नित्य प्रतिदिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। उसके बाद अपना मुंह पूर्व दिशा में रखें और कुशा या कपड़े के आसन पर बैठ जाएं। और पहले गाय के घी का दिया जलाएं और एक कलश में शुद्ध जल भरकर रखें। और मिश्री प्रसाद रखें। तत्पश्चात भगवान शिव की धूप, दीप , फल , फूल , बेलपत्र आदि से पूजा करें और शिव चालीसा का पाठ 3,5,11 या फिर 40 बार पाठ करें।
                                 ॥ चौपाई
जय गिरिजा पति दीन दयाला   सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥1॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके    कानन कुण्डल नागफनी के ॥2॥
अंग गौर शिर गंग बहाये    मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥3॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे   छवि को देखि नाग मन मोहे 4
मैना मातु की हवे दुलारी   बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥5॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी   करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥6॥
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे   सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥7॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ   या छवि को कहि जात काऊ 8
देवन जबहीं जाय पुकारा   तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥9॥
किया उपद्रव तारक भारी   देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥10॥
तुरत षडानन आप पठायउ   लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥11॥
आप जलंधर असुर संहारा    सुयश तुम्हार विदित संसारा 12
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई   सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥13॥
किया तपहिं भागीरथ भारी   पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥14॥
दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं   सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥15॥
वेद नाम महिमा तव गाई।   अकथ अनादि भेद नहिं पाई 16
प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला   जरत सुरासुर भए विहाला ॥17॥
कीन्ही दया तहं करी सहाई    नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥18॥
पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा   जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥19॥
सहस कमल में हो रहे धारी   कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी 20
एक कमल प्रभु राखेउ जोई    कमल नयन पूजन चहं सोई ॥21॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर   भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥22॥
जय जय जय अनन्त अविनाशी   करत कृपा सब के घटवासी ॥23॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै   भ्रमत रहौं मोहि चैन आवै 24
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो   येहि अवसर मोहि आन उबारो ॥25॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो   संकट से मोहि आन उबारो ॥26॥
मात-पिता भ्राता सब होई   संकट में पूछत नहिं कोई ॥27॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी   आय हरहु मम संकट भारी 28
धन निर्धन को देत सदा हीं   जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥29॥
अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी   क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥30॥
शंकर हो संकट के नाशन    मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥31॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं   शारद नारद शीश नवावैं 32
नमो नमो जय नमः शिवाय   सुर ब्रह्मादिक पार पाय ॥33॥
जो यह पाठ करे मन लाई   ता पर होत है शम्भु सहाई ॥34॥
ॠनियां जो कोई हो अधिकारी   पाठ करे सो पावन हारी ॥35॥
पुत्र हीन कर इच्छा जोई   निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई 36
पण्डित त्रयोदशी को लावे   ध्यान पूर्वक होम करावे ॥37॥
त्रयोदशी व्रत करै हमेशा   ताके तन नहीं रहै कलेशा ॥38॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे   शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥39॥
जन्म जन्म के पाप नसावे   अन्त धाम शिवपुर में पावे 40
कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी   जानि सकल दुःख हरहु हमारी41॥ 
दोहा
नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा तुम मेरी मनोकामनापूर्ण करो जगदीश
मगसर छठि हेमन्त ॠतुसंवत चौसठ जान अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण
पाठ पूरा हो जाने पर कलश का जल सारे घर में छिड़क दें।  थोड़ा सा जल स्वयं पी लें और मिश्री प्रसाद के रूप में खाएं, घर में भी मिश्री प्रसाद  सभी को दें।








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