सूर्य ग्रह के सकारात्मक व नकारात्मक प्रभाव

सूर्य ग्रह के सकारात्मक
व नकारात्मक प्रभाव  

ज्योतिष के अनुसार सूर्य ग्रह
सूर्य ग्रह को ज्योतिष में सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली ग्रह माना गया है। प्रचलित मान्यता के अनुसार सूर्य महर्षि कश्यप के पुत्र हैं और माता का नाम अदिति है, माता का नाम अदिति होने के कारण सूर्य का एक नाम आदित्य भी है। सूर्य सभी ग्रहों का स्वामी कहलाता है। सूर्य एक पुरुष ग्रह है, ज्योतिष में सूर्य पिता, पुत्र, हृदय और सत्ता यश, मान, कीर्ति और प्रतिष्ठा, प्रशासनिक पद का  कारक ग्रह है। और शरीर में पेट, आंख, हड्डियों, हृदय चेहरे पर इनका आधिपत्य माना जाता है। सूर्य सिंह राशि के स्वामी है, और मेष राशि में सूर्य उच्च होता है, जबकि तुला सूर्य की नीच राशि है। सूर्य का 12 भावों में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही तरह से अपना प्रभाव देता है।

सूर्य ग्रह के सकारात्मक प्रभाव
सूर्य ग्रह की सकारात्मक स्थिति जातक के भाग्य को स्वर्ण की तरह चमकाने की ताकत रखती है। ऐसे व्यक्ति की राह में जितनी रुकावटें आती हैं वह उन रुकावटों को अवसरों परिवर्तन कर आगे बढ़ता है, और अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है जातक को अपने जीवन में पिता का पूर्ण सहयोग मिलता है, पिता के साथ जातक के मधुर संबंध रहते है। सूर्य का सकारात्मक प्रभाव जातकों को समाज में मान-सम्मान दिलाता है। इसके साथ ही सरकारी क्षेत्र में जातक उच्च पद की प्राप्ति करता है। इसके अलावा सूर्य के शुभ प्रभाव के कारण व्यक्ति समाज का नेतृत्व करता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी जातक सदैव ऊर्जावान बना रहता है और उसके साहस में वृद्धि होती है। सूर्य का सकारात्मक प्रभाव जातकों की आभा को तेजवान बनाता है। जिस जातक की कुंडली में सूर्य उच्च में होता है तो वह जातक स्वयं के बल पर कार्यक्षेत्र में उन्नति प्राप्त करता है।
  

सूर्य ग्रह के नकारात्मक प्रभाव
सूर्य ग्रह का नकारात्मक प्रभाव जातक को अहंकारी बनाता है। जातक अपने से संबंधित चीज़ों को लेकर घमंडी हो जाता है। जातक में आत्मविश्वास की कमी हो सकती है। सूर्य ग्रह की नकारात्मक स्थिति में जातक अपयश एवं आक्षेपों का भागी बनता है। इसके साथ सूर्य का नकारात्मक प्रभाव जातक को विश्वासहीन, ईर्ष्यालु, क्रोधी, महत्वाकांक्षी, आत्म केंद्रित, क्रोधी आदि बनाता है। जातक को हड्डी एवं नेत्र संबंधी समस्या का सामना करना पड़ता है। पिता से संबंधों ख़राब होते है छोटी-छोटी बातों को लेकर पिताजी से झगड़ा अथवा उनसे मतभेद बना रहता है। पीड़ित सूर्य का प्रभाव जातकों के वैवाहिक जीवन पर भी नकारात्मक असर डालता है

सूर्य ग्रह की शांति के टोटके/उपाय
(1) पति-पत्नी में से किसी एक को गुड़ से परहेज करना चाहिए
(2) कुल परम्परा, धार्मिक परम्पराओं का पालन करना चाहिए
(3) पिता से मतभेद रखें। बल्कि सदैव उनका सम्मान करें
(4) मुफ्त की चीज़ लें।
(5) माँ का आशीर्वाद सदैव लें और चावल-दूध का दान करें।
(6) अंधे व्यक्ति की सहायता करें।
(7) दूसरों के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करें।
(8) किसी नदी या नहर में लगातार 43 दिनों तक तांबें का एक सिक्का डालें
(9) सूर्य से सम्बंधित वस्तुओं का दान करें।

सूर्य की वस्तुओं का दान
सूर्य की दान देने वाली वस्तुओं में तांबा, गुड़, गेहूं, मसूर दाल, माणिक्य लाल कपड़े, लाल पुष्प, सुवर्ण आदि दान की जा सकती है। यह दान प्रत्येक रविवार या सूर्य संक्रांति के दिन किया जा सकता है। सूर्य ग्रहण के दिन भी सूर्य की वस्तुओं का दान करना लाभकारी रहता है।
नोट-: किसी भी ग्रह का दान करने से पहले किसी अच्छे ज्योतिषी से अपनी कुंडली का विश्लेषण करा लेने के बाद ही  दान करना चाहिए क्योंकि कुंडली में बैठे ग्रहों के आधार पर ही जान सकते हैं की किस ग्रह का दान करना चाहिए और किस ग्रह का दान नहीं करना चाहिए।

                 सूर्य के मंत्र रत्न विवरण
सूर्य का रत्न -: माणिक्य (रूबी)
सूर्य गायत्री मंत्र-:  आदित्याय विदमहे दिवाकराय धीमहि तन्न: सूर्य: प्रचोदयात
सूर्य मंत्र जाप संख्या   7 हजार मंत्र जाप
सूर्य का तांत्रोक्त मंत्र-:  ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः
सूर्य का वैदिक मंत्र-:  आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यण्च हिरण्य़येन सविता रथेन देवो याति भुवनानि पश्यन।
सूर्य का पौराणिक मंत्र-: जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम तमोरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोस्मि दिवाकरम

सूर्य को अर्घ्य देने के लाभ
प्रातःकाल सूर्य को जल  अवश्य अर्पण करें सूर्य के उदय होने के एक घंटे के अंदर अर्घ्य देना चाहिए। अर्घ्य देते समय हाथ सिर से ऊपर होने चाहिए। ऐसा करने से सूर्य की सातों किरणें शरीर पर पड़ती हैं।  इससे बल, बुद्धि, विद्या और दिव्यता प्राप्त होती है।

सूर्य की सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाने के लिए तथा नकारात्मक उर्जा को कम करने के लिए आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं।

आदित्य हृदय स्तोत्र
 विनियोग
अस्य आदित्यह्रदय स्तोत्रस्य अगस्त्यऋषि: अनुष्टुप्छन्दः आदित्यह्रदयभूतो
भगवान् ब्रह्मा देवता निरस्ताशेषविघ्नतया ब्रह्माविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ विनियोगः
पूर्व पिठिता
ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्1
दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम् उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा 2
राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्मं सनातनम् येन सर्वानरीन्वत्स समरे विजयिष्यसे 3
आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम् जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम्4
सर्वमंगलमागल्यं सर्वपापप्रणाशनम् चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम्5
मूल -स्तोत्र
रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम् पुजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्6
सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावन: एष देवासुरगणांल्लोकान्पाति गभस्तिभि: 7
एष ब्रह्मा विष्णुश्च शिव: स्कन्द: प्रजापति: महेन्द्रो धनद: कालो यम: सोमो ह्यापां पतिः 8
पितरो वसव: साध्या अश्विनौ मरुतो मनु: वायुर्वहिन: प्रजा प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकर: 9
आदित्य: सविता सूर्य: खग: पूषा गभस्तिमान् सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकर: 10
हरिदश्व: सहस्त्रार्चि: सप्तसप्तिर्मरीचिमान् तिमिरोन्मथन: शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान्11
हिरण्यगर्भ: शिशिरस्तपनोऽहस्करो रवि: अग्निगर्भोऽदिते: पुत्रः शंखः शिशिरनाशन: 12
व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजु:सामपारग: घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः 13
आतपी मण्डली मृत्यु: पिगंल: सर्वतापन: कविर्विश्वो महातेजा: रक्त:सर्वभवोद् भव: 14
नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावन: तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्नमोऽस्तु ते 15
नम: पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नम: ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नम: 16
जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नम: नमो नम: सहस्त्रांशो आदित्याय नमो नम: 17
नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नम: नम: पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते 18
ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सुरायादित्यवर्चसे भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नम: 19
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नम: 20
 तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे 21
नाशयत्येष वै भूतं तमेष सृजति प्रभु: पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभि: 22
एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठित: एष चैवाग्निहोत्रं फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्23
देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतुनां फलमेव यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमं प्रभु: 24
एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु कीर्तयन्पुरुष: कश्चिन्नावसीदति राघव 25
पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगप्ततिम् एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि 26
अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि एवमुक्ता ततोऽगस्त्यो जगाम यथागतम्27
एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्तदा धारयामास सुप्रीतो राघव प्रयतात्मवान्28
आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान् त्रिराचम्य शूचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्29
रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थं समुपागतम् सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत्30
अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमना: परमं प्रहृष्यमाण:
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति 31
।।सम्पूर्ण ।।

            

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