अध्यात्मिक ज्ञान और मानव जीवन

 

श्लोक 1 : त्रिविधं नरकस्येदं द्वारम नाशनमात्मन

कामक्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥

अर्थ:- कामक्रोधऔर लोभ – ये  आत्मा  का  नाश  करने  वाले  नरक  के  तीन  दरवाजे  हैं,  अतः  इन  तीनो  को त्याग देना चाहिए।

श्लोक 2 :  पन्चाग्न्यो मनुष्येण परिचर्याप्रयत्नत

पिता माताग्निरात्मा  गुरुश्च भरतर्षभ॥

अर्थ: पितामाता अग्नि,आत्मा और गुरु  मनुष्य को इन पांच अग्नियों की बड़े यत्न से सेवा करनी चाहिए।

श्लोक 3 :  षड् दोषापुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छिता

निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता॥

अर्थ: ऐश्वर्य या उन्नति चाहने वाले पुरुषों को नींदतन्द्रा (उंघना ), डरक्रोध,आलस्य तथा दीर्घ सूत्रता (जल्दी हो जाने वाले कामों में अधिक समय लगाने की आदत )इन दुर्गुणों को त्याग देना चाहिए।

श्लोक 4 :  षडेव तु गुणाः पुंसा  हातव्याः कदाचन।

सत्यं दानमनालस्यमनसूया क्षमा धृतिः॥

अर्थ: मनुष्य को कभी भी सत्यदानकर्मण्यताअनसूया (गुणों में दोष दिखाने की प्रवृत्ति का अभाव ), क्षमा तथा धैर्य – इन छः गुणों का त्याग नहीं करना चाहिए।

श्लोक  5 :  अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति प्रज्ञा  कौल्यं  दमः श्रुतं च।

पराक्रमश्चाबहुभाषिता   दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च॥

अर्थ: बुद्धिकुलीनताइन्द्रियनिग्रहशास्त्रज्ञानपराक्रमअधिक  बोलनाशक्ति के अनुसार दान और कृतज्ञता – ये आठ गन पुरुष की ख्याति बढ़ा देते हैं।

श्लोक 6 :  अर्थागमो नित्यमरोगिता  प्रिया  भार्य प्रियवादिनी  

वश्यश्च पुत्रोऽर्थकरी  विद्या षट् जीवलोकस्य सुखानि राजन् 

 अर्थ:  धन प्राप्तिस्वस्थ जीवनअनुकूल पत्नीमीठा बोलने वाली पत्नीआज्ञाकारी पुत्र तथा धनाजर्न करने वाली विद्या का ज्ञान से छह बातें संसार में सुख प्रदान करती हैं 

श्लोक 7 : सत्येन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते 

मृजया रक्ष्यते रुपं कुलं वृत्तेन रक्ष्यते 

 अर्थ:  धर्म की रक्षा सत्य से होती है ,विद्या की रक्षा अभ्यास से ,सौंदर्य की रक्षा स्वच्छता से तथा कुल की रक्षा सदाचार से होती है।

श्लोक 8  : अभ्यावहति कल्याणं विविधं वाक् सुभाषिता

सैव दुर्भाषिता राजनर्थायोपपद्यते 

 अर्थ:  मीठे शब्दों में बोली गई बात हितकारी होती है और उन्नति के मार्ग खोलती है लेकिन यदि वही बात कटुतापूर्ण शब्दों में बोली जाए तो दुःखदायी होती है और उसके दूरगामी दुष्परिमाण होते हैं

श्लोक 9 : कर्मणा मनसा वाचा यदभीक्षणं निषेवते।

तदेवापहरत्येनं तस्मात् कल्याणमाचरेत् 

 अर्थ:  मनवचनऔर कर्म से हम लगातार जिस वस्तु के बारे में सोचते हैंवही हमें अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। अतः हमे सदा शुभ चीजों का चिंतन करना चाहिए।

श्लोक 10 : आलस्यं मदमोहौ चापलं गोष्टिरेव च।

स्तब्धता चाभिमानित्वं तथा त्यागित्वमेव च।

एते वै सप्त दोषाः स्युः सदा विद्यार्थिनां मताः 

अर्थ:  विद्यार्थियों को सात अवगुणों से दूर रहना चाहिए। ये हैं आलसनशाचंचलतागपशपजल्दबाजीअहंकार और लालच।

श्लोक 11 :  सा सभा यत्र  सन्ति वृद्धा , वृद्धा  ते ये  वदन्ति धर्मम् 

नासौ धर्मो यत्र  सत्यमस्ति , तत्सत्यं यच्छलेनाभ्युपेतम् 

अर्थ:  वह सभा ही नहीं है जिसमें वृद्ध  हों,वे वृद्ध ही नहीं हैं जो धर्म का कथन नहीं करते,वह धर्म नहीं है जिसमें सत्य  हो और वह सत्य नहीं है जो छल से युक्त हो।

श्लोक 12 : पूजनीया महाभागापुण्याश्च गृहदीप्तयः  

स्त्रियः श्रियो गृहस्योक्तास्तस्माद् रक्ष्या विशेषतः 

अर्थ:  स्त्रियाँ आदर के योग्यअत्यन्त सौभाग्यशालिनीपवित्रघर की शोभा और लक्ष्मीरुप गृह की समृद्धि कही गयी हैंअतः इनकी विशेष रुप से रक्षा करनी चाहिए।

श्लोक 13 : पंचैव पूजयन् लोके यशप्राप्नोति केवलं 

देवान् पितॄन् मनुष्यांश्च भिक्षून् अतिथि पंचमान् 

 अर्थ:  देवतापितरमनुष्यभिक्षुक तथा अतिथि-इन पाँचों की सदैव सच्चे मन से पूजा-स्तुति करनी चाहिए  इससे यश और सम्मान प्राप्त होता है 

श्लोक 14:  देवा दण्डमादाय रक्षन्ति पशुपालवत्।

यं तु रक्षितुमिच्छन्ति बुद्ध्या संविभजन्ति तम्॥

अर्थ:  देवता किसी भी मनुष्य की , स्वयं हाथ मे शस्त्र लेकर रक्षा नही करते।जिनका रक्षण करने की इच्छा करते हैउन्हे "बुध्दिप्रदान करने का मार्ग प्रशस्त करते है।

श्लोक 15 : धृतिशमो दमशौचं कारुण्यं वागनिष्ठुरा 

मित्राणां चानभिद्रोहसप्तैतासमिधश्रिय

अर्थ:  धैर्यमनोनिग्रहइन्द्रिय संयमपवित्रतादयाकोमल वाणीऔर मित्र से द्रोह  करनाये सात बाते लक्ष्मी को बढ़ाने वाली है।

श्लोक 16 : आरोग्यमानृण्यमविप्रवासः सद्भिर्मनुष्यैस्सह संप्रयोगः।

स्वप्रत्यया वृत्तिरभीतवासः षट् जीवलोकस्य सुखानि राजन्॥

अर्थ:  स्वस्थ रहना, उऋण रहना, परदेश में रहना, सज्जनों के साथ मेल-जोल, स्वव्यवसाय द्वारा आजीविका चलाना तथा भययुक्त जीवनयापन - ये छह बातें सांसारिक सुख प्रदान करती हैं।  

श्लोक 17 : एको धर्म: परम श्रेय: क्षमैका शान्तिरुक्तमा।
विद्वैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा॥

अर्थ:  केवल धर्म-मार्ग ही परम कल्याणकारी है, केवल क्षमा ही शांति का सर्वश्रेष्ट उपाय है, केवल ज्ञान ही परम संतोषकारी है तथा केवल अहिंसा ही सुख प्रदान करने वाली है

श्लोक 18 : आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।

नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥

अर्थ:  व्यक्ति का सबसे बड़ा दुश्मन आलस्य होता है। व्यक्ति का परिश्रम ही उसका सच्चा मित्र होता है। क्योंकि जब भी मनुष्य परिश्रम करता है तो वह दुखी नहीं होता है और हमेशा खुश ही रहता है। 

श्लोक 19 : अनादरो विलम्बश्च वै मुख्यम निष्ठुर वचनम।
पश्चतपश्च पञ्चापि दानस्य दूषणानि च॥

अर्थ:  अपमान करके देना, मुंह फेर कर देना, देरी से देना, कठोर वचन बोलकर देना और देने के बाद पछ्चाताप होना। ये सभी 5 क्रियाएं दान को दूषित कर देती है।

श्लोक 20 : प्रदोषे दीपक : चन्द्र:,प्रभाते दीपक:रवि:
त्रैलोक्ये दीपक:धर्म:,सुपुत्र: कुलदीपक:

अर्थ:  संध्या काल में चन्द्रमा दीपक है, प्रभात काल में सूर्य दीपक है, तीनों लोकों में धर्म दीपक है और सुपुत्र कूल का दीपक है।

श्लोक 21 : परो अपि हितवान् बन्धुः बन्धुः अपि अहितः परः।
अहितः देहजः व्याधिः हितम् आरण्यं औषधम्।।

अर्थ:  यदि कोई अपरिचित व्यक्ति आपकी मदद करें तो उसको अपने परिवार के सदस्य की तरह ही महत्व दें और अपने परिवार का सदस्य ही आपको नुकसान देना शुरू हो जाये तो उसे महत्व देना बंद कर दें। ठीक उसी तरह जैसे शरीर के किसी अंग में कोई बीमार हो जाये तो वह हमें तकलीफ पहुंचती है। जबकि जंगल में उगी हुई औषधी हमारे लिए लाभकारी होती है।

श्लोक 22 : अधमाः धनमिच्छन्ति धनं मानं मध्यमाः।
उत्तमाः मानमिच्छन्ति मानो हि महताम् धनम्।।

अर्थ:  निम्न कोटि के लोग सिर्फ धन की इच्छा रखते हैं। मध्यम कोटि का व्यक्ति धन और सम्मान दोनों की इच्छा रखता है। वहीं एक उच्च कोटि के व्यक्ति के लिए सिर्फ सम्मान ही मायने रखता है। सम्मान से अधिक मूल्यवान है।

श्लोक 23 : सहसा विदधीत क्रियामविवेकः परमापदां पदम्।
वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव संपदः।

अर्थ:  हमें अचानक आवेश या जोश में आकर कोई काम नहीं करना चाहिए। क्योंकि विवेक हीनता सबसे बड़ी विपतियों का कारण होती है। इसके विपरीत जो व्यक्ति सोच समझकर कार्य करता है। गुणों से आकृष्ट होने वाली मां लक्ष्मी स्वयं ही उसका चुनाव कर लेती है। 

श्लोक 24 : कार्यार्थी भजते लोकं यावत्कार्य सिद्धति।
उत्तीर्णे परे पारे नौकायां किं प्रयोजनम्।।

अर्थ:  जब तक काम पूरे नहीं होते हैं तब तक लोग दूसरों की प्रशंसा करते हैं। काम पूरा होने के बाद लोग दूसरे व्यक्ति को भूल जाते हैं। ठीक उसी तरह जैसे नदी पार करने के बाद नाव का कोई उपयोग नहीं रह जाता है।


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